英国还在为脱离欧盟纠结不已,法国和德国又高调地重温半个多世纪前的睦邻友好、同仇敌忾的誓言,签署了《亚琛条约》,宣告法德友好合作的决心和行动目标。
时间、地点、事件,无不晕染厚重的历史色彩。
法国总统马克龙和德国总理默克尔1月22日在德国西部边境城市亚琛签署两国友好合作条约,与1963年1月22日他们各自的前辈在巴黎签署的《爱丽舍宫条约》遥相呼应。
当年的条约和签约这件事本身,被视为变仇敌为睦邻、化干戈为玉帛、世代友好的历史宣言和象征。
今天的新版友谊宣言,被观察人士解读为意在重振法德轴心在欧盟内的地位。
地点选在亚琛, 更加重了历史和象征色彩。历史上亚琛曾被归入法国版图,阿尔萨斯-洛林地区说法语还是德语曾经是爱不爱国的选择,地区的归属在历史课本上占据了相当篇幅。
《亚琛条约》大致可以看作1963年1月22日签署的法德友好合作条约,《爱丽舍宫条约》的新版。
法国和德国承诺在涉及欧盟的重大议题上保持一致立场,发表共同声明。
此外,双方还计划在联合国以"共同体"的形象出现,步调一致,同进共退。
根据条约,两国在外交政策、国内外安全事务和其他诸多领域都将异口同声。
具体而言,巴黎和柏林承诺:
建立法德"经济区",以此深化两国经济交融;
提升欧洲军事实力,共同投资于"拾遗补缺",以达到强化欧盟和北约的目的;
成立法德防务与安全理事会,同时各自在本国军营里倡导和培育"共同文化",联合部署、调遣;
两国还承诺加强青年文化交流,各自在国内倡导学习对方的语言,最终目标是创办一所法德联合兴办的大学。
另外,还计划进一步密切法德边境地区的双边往来交流,加深边境线两侧的"双语性"。
就在56年前,1963年1月22日,彰显法德友好合作的《爱丽舍宫条约》在巴黎签署,向世界宣告双方化干戈为玉帛,世仇变睦邻。
自那以后,两国历届政府都多次祭出这份条约文本,重申法德友好、合作精神。
德国康斯塔茨大学国际关系教授德克·卢芬(Dirk Leuffen)认为,《亚琛条约》的精神跟它要取代的《爱丽舍宫条约》没有戏剧性的变化,更多是传承,或者说是翻新原有的目标,使之显得与时俱进,更切合两国当下面临的挑战。
他认为新条约勾勒的经济合作方案,明显就是两国密切联盟的下一步。
但英国卡迪夫大学教授阿利斯泰·科尔(Alistair Cole)认为,新的友好条约更多是一种象征性姿态。
在英国脱欧的大背景下,法国和德国重申56年前的友好合作誓言,是希望昭示天下,欧盟的核心和引擎依旧是法德,"虽然在现实中两个国家经常有分歧闹矛盾"。
德国总理默克尔解释说,新签这个友好条约,主要因为时代变了,世界跟半个多世纪前不一样了,而且现在大家面临的重大课题,比如欧洲一体化,当时连个雏形都还没有。
一些欧盟国家不太乐意看到法国和德国如此高调秀友谊,认为这两个国家在欧盟已经势力太大了。中欧和东欧国家在移民问题上已经公开拒绝听从德法的引领。
意大利也不喜欢德法联手扩充势力。意大利内政部长马泰奥·萨尔维尼毫不讳言,现在该"用意大利-波兰轴心抗衡法-德轴心"。
他说这话时正在波兰访问,此行主要目的是想在今年5月欧洲议会选举前合纵连横,组成一个挑战欧盟内法德主导地位的联盟。
法国国内冒出不少反对条约的阴谋论,声称马克龙总统签约把法国领土拱手送人。法国社交媒体上盛传亚琛条约将导致阿尔萨斯和洛林边境地区事实上让给了德国,即使官方奋力辟谣也未能平息风波。
极右翼领袖勒庞甚至指责马克龙去亚琛跟默克尔签新的法德友好合作条约,就等于在摧毁戴高乐将军取得的成果,即带领法国侪身世界一流大国行列。
Wednesday, January 23, 2019
Monday, January 7, 2019
मार-धाड़ वाली टीवी सिरीज़ के दीवानें क्यों होते हैं लोग?
अपराध गुनाह है और इसकी सज़ा भी तय है. फिर भी इंसान गुनाह करता है. कई बार अपराध के बाद इंसान ख़ुद ही पशेमान हो जाता है और जुर्म क़ुबूल कर लेता है.
लेकिन बहुत मर्तबा वो इतनी सफ़ाई से गुनाह करता है कि उसके निशान तक बाक़ी नहीं रहते. अपराध पर लगाम कसने वाली और अपराधी को पकड़ने वाली एजेंसियां भी घनचक्कर बनकर रह जाती हैं.
मिसाल के लिए भारत की मशहूर मर्डर मिस्ट्री आरूषि के केस को ही लीजिए. पुलिस इस केस में पर्याप्त सबूत तक नहीं जुटा पाई.
हालांकि, मौक़े पर मौजूद सबूतों के आधार पर आरूषि के माता-पिता को मुजरिम माना गया और उन्हें जेल में रहना पड़ा. लेकिन बाद में कोर्ट ने ये कहते हुए उन्हें बरी कर दिया कि सिर्फ़ परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर उन्हें मुजरिम नहीं माना जा सकता.
इस मर्डर मिस्ट्री पर किताब लिखी गई, फ़िल्म बनी. लेकिन ये क़त्ल एक राज़ ही बना रहा.
इसी तरह गुरुग्राम के नामी स्कूल में बच्चे का क़त्ल या हाल ही में दिल्ली में एक परिवार के 11 लोगों के एक साथ ख़ुदकुशी करने की घटनाएं.
इंसान की अपराध में दिलचस्पी शुरुआत से रही है. तभी तो साहित्य में भी इसे जगह मिली. अंग्रेजी में शरलॉक होम्स हों या उर्दू के इब्ने सफ़ी. इनकी लिखी कहानियों में ख़ालिस जुर्म का बखान होता था. लेकिन फिर भी लोग उसे ख़ूब चाव से पढ़ते थे.
इनकी किताबों के मुख्य किरदार आम लोगों के लिए हीरो बन जाते थे. लोगों की इसी रुचि को बाज़ार ने भी ख़ूब भुनाया. यही वजह है कि आज एंटरटेनमेंट चैनल हों या न्यूज़ चैनल सभी जगह क्राइम का एक शो देखने को मिल ही जाता है.
यहां तक की एंटरटेनमेंट के नए प्लेटफॉर्म जैसे नेटफ्लिक्स और प्राइम वीडियो पर भी द सेक्रेड गेम्स और मिर्ज़ापुर या अपहरण जैसे सीरियल धूम मचाए हुए हैं. ये वही सीरियल हैं जो जुर्म की दुनिया को आम लोगों तक पहुंचाते हैं.
दरअसल जुर्म पर आधारित साहित्य, फ़िल्म या सीरियल में दिखाई जाने वाली कहानियां कहीं ना कहीं असल ज़िंदगी में घटी घटनाओं से प्रभावित होती हैं. दुनिया भर में ऐसी अनगिनत मर्डर मिस्ट्री, डकैती और अपहरण की घटनाएं हैं जो अनसुलझी हैं. आज जुर्म की ऐसी ही अनसुलझी पहेलियों की बात हम आपसे करेंगे.
दुनिया की बड़ी मर्डर मिस्ट्री पर बीबीसी ने डेथ इन आइस वेली नाम का एक पॉडकास्ट किया था जिसमें द इस्डाल वुमेन की मर्डर मिस्ट्री सुलझाने की कोशिश की गई थी. ये घटना साल 1970 की थी.
नॉर्वे में इस्डालिन वैली के पास एक महिला की जली हुई लाश मिली थी. उसके शरीर पर कपड़े नहीं थे और अजीब सी चीजें उसके पास पड़ी थीं. बाद में पुलिस को एक जाली पासपोर्ट मिला लेकिन ये महिला कौन थी ये किसी को आज तक पता नहीं चल पाया.
मीडिया ने इसे द इस्डाल वुमेन का नाम दिया. ये क़त्ल था या ख़ुदकुशी, ये भी आज तक पता नहीं चला. 2018 में नॉर्वे के खोजी पत्रकार मैरियट हिगराफ़ और डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म मेकर नाइल मैक्कार्थी ने भी इस केस को सुलझाने की कोशिश की लेकिन कामयाबी नहीं मिली.
इसी तरह 2017 की ब्लॉकबस्टर पॉडकास्ट सीरीज़ है एस-टाउन. ये सीरीज़ जॉन बी.मैक्लेमोर नाम के घड़ीसाज़ का दिलजस्प प्रोफ़ाइल है जिसका ताल्लुक़ अमरीका के अलाबामा से है.
हालांकि इस सीरीज़ में मुख्य किरदार की बहुत सी निजी बातों को उसकी मर्ज़ी के बग़ैर लोगों तक पहुंचा दिया गया था.जिसके ख़िलाफ़ मैक्लेमोर ने कोर्ट में केस दाख़िल कर दिया था.
एस-टाउन ने एक कथित क़त्ल की छानबीन की थी और इस पॉडकास्ट की कामयाबी ने साबित कर दिया कि लोगों में जुर्म के क़िस्सों को सुनने की कितनी ललक है. इस पॉडकास्ट की कामयाबी का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि साल 2017 से अब तक इसे 80 लाख बार डाउनलोड किया जा चुका है.
इसी तरह, इन द डार्क नाम के खोजी पत्रकारिता के पॉडकास्ट के पहले सीज़न में 11 साल के एक बच्चे के अपहरण की कहानी को बताया गया था जो मिनेसोटा में घर के बाहर साइकिल चलाते समय अग़वा कर लिया गया था.
दूसरे सीज़न में मिसिसिपी के कर्टिस फ्लावर्स नाम के एक शख़्स की कहानी बताई गई थी जिसने 1996 में एक फ़र्नीचर शॉप में चार मज़दूरों को मार डाला था. ये वही फ़र्नीचर शॉप थी जहां वो ख़ुद पहले काम कर चुका था.
लेकिन बहुत मर्तबा वो इतनी सफ़ाई से गुनाह करता है कि उसके निशान तक बाक़ी नहीं रहते. अपराध पर लगाम कसने वाली और अपराधी को पकड़ने वाली एजेंसियां भी घनचक्कर बनकर रह जाती हैं.
मिसाल के लिए भारत की मशहूर मर्डर मिस्ट्री आरूषि के केस को ही लीजिए. पुलिस इस केस में पर्याप्त सबूत तक नहीं जुटा पाई.
हालांकि, मौक़े पर मौजूद सबूतों के आधार पर आरूषि के माता-पिता को मुजरिम माना गया और उन्हें जेल में रहना पड़ा. लेकिन बाद में कोर्ट ने ये कहते हुए उन्हें बरी कर दिया कि सिर्फ़ परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर उन्हें मुजरिम नहीं माना जा सकता.
इस मर्डर मिस्ट्री पर किताब लिखी गई, फ़िल्म बनी. लेकिन ये क़त्ल एक राज़ ही बना रहा.
इसी तरह गुरुग्राम के नामी स्कूल में बच्चे का क़त्ल या हाल ही में दिल्ली में एक परिवार के 11 लोगों के एक साथ ख़ुदकुशी करने की घटनाएं.
इंसान की अपराध में दिलचस्पी शुरुआत से रही है. तभी तो साहित्य में भी इसे जगह मिली. अंग्रेजी में शरलॉक होम्स हों या उर्दू के इब्ने सफ़ी. इनकी लिखी कहानियों में ख़ालिस जुर्म का बखान होता था. लेकिन फिर भी लोग उसे ख़ूब चाव से पढ़ते थे.
इनकी किताबों के मुख्य किरदार आम लोगों के लिए हीरो बन जाते थे. लोगों की इसी रुचि को बाज़ार ने भी ख़ूब भुनाया. यही वजह है कि आज एंटरटेनमेंट चैनल हों या न्यूज़ चैनल सभी जगह क्राइम का एक शो देखने को मिल ही जाता है.
यहां तक की एंटरटेनमेंट के नए प्लेटफॉर्म जैसे नेटफ्लिक्स और प्राइम वीडियो पर भी द सेक्रेड गेम्स और मिर्ज़ापुर या अपहरण जैसे सीरियल धूम मचाए हुए हैं. ये वही सीरियल हैं जो जुर्म की दुनिया को आम लोगों तक पहुंचाते हैं.
दरअसल जुर्म पर आधारित साहित्य, फ़िल्म या सीरियल में दिखाई जाने वाली कहानियां कहीं ना कहीं असल ज़िंदगी में घटी घटनाओं से प्रभावित होती हैं. दुनिया भर में ऐसी अनगिनत मर्डर मिस्ट्री, डकैती और अपहरण की घटनाएं हैं जो अनसुलझी हैं. आज जुर्म की ऐसी ही अनसुलझी पहेलियों की बात हम आपसे करेंगे.
दुनिया की बड़ी मर्डर मिस्ट्री पर बीबीसी ने डेथ इन आइस वेली नाम का एक पॉडकास्ट किया था जिसमें द इस्डाल वुमेन की मर्डर मिस्ट्री सुलझाने की कोशिश की गई थी. ये घटना साल 1970 की थी.
नॉर्वे में इस्डालिन वैली के पास एक महिला की जली हुई लाश मिली थी. उसके शरीर पर कपड़े नहीं थे और अजीब सी चीजें उसके पास पड़ी थीं. बाद में पुलिस को एक जाली पासपोर्ट मिला लेकिन ये महिला कौन थी ये किसी को आज तक पता नहीं चल पाया.
मीडिया ने इसे द इस्डाल वुमेन का नाम दिया. ये क़त्ल था या ख़ुदकुशी, ये भी आज तक पता नहीं चला. 2018 में नॉर्वे के खोजी पत्रकार मैरियट हिगराफ़ और डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म मेकर नाइल मैक्कार्थी ने भी इस केस को सुलझाने की कोशिश की लेकिन कामयाबी नहीं मिली.
इसी तरह 2017 की ब्लॉकबस्टर पॉडकास्ट सीरीज़ है एस-टाउन. ये सीरीज़ जॉन बी.मैक्लेमोर नाम के घड़ीसाज़ का दिलजस्प प्रोफ़ाइल है जिसका ताल्लुक़ अमरीका के अलाबामा से है.
हालांकि इस सीरीज़ में मुख्य किरदार की बहुत सी निजी बातों को उसकी मर्ज़ी के बग़ैर लोगों तक पहुंचा दिया गया था.जिसके ख़िलाफ़ मैक्लेमोर ने कोर्ट में केस दाख़िल कर दिया था.
एस-टाउन ने एक कथित क़त्ल की छानबीन की थी और इस पॉडकास्ट की कामयाबी ने साबित कर दिया कि लोगों में जुर्म के क़िस्सों को सुनने की कितनी ललक है. इस पॉडकास्ट की कामयाबी का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि साल 2017 से अब तक इसे 80 लाख बार डाउनलोड किया जा चुका है.
इसी तरह, इन द डार्क नाम के खोजी पत्रकारिता के पॉडकास्ट के पहले सीज़न में 11 साल के एक बच्चे के अपहरण की कहानी को बताया गया था जो मिनेसोटा में घर के बाहर साइकिल चलाते समय अग़वा कर लिया गया था.
दूसरे सीज़न में मिसिसिपी के कर्टिस फ्लावर्स नाम के एक शख़्स की कहानी बताई गई थी जिसने 1996 में एक फ़र्नीचर शॉप में चार मज़दूरों को मार डाला था. ये वही फ़र्नीचर शॉप थी जहां वो ख़ुद पहले काम कर चुका था.
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