रक्षा मंत्री यशवंतराव चव्हाण, एयर मार्शल अर्जन सिंह और रक्षा मंत्रालय में विशेष सचिव एचसी सरीन, एडजुटेंट जनरल लेफ़्टिनेंट जनरल कुमारमंगलम के साथ गहन मंत्रणा में व्यस्त थे. मुद्दा था छंब सेक्टर में उस दिन सुबह हुआ पाकिस्तानी टैंकों और तोपों का ज़बरदस्त हमला जिसने भारतीय सेना और ख़ुफ़िया एजेंसियों को अचरज में डाल दिया था.
बैठक शुरू हुए अभी आधा घंटा भी नहीं हुआ था कि थलसेनाध्यक्ष जनरल चौधरी ने कमरे में प्रवेश किया. उन्होंने एयर मार्शल अर्जन सिंह के साथ कुछ देर दबे शब्दों में बात की और रक्षा मंत्री चव्हाण की तरफ़ देख कर कहा कि उन्हें छंब सेक्टर में वायु सेना के इस्तेमाल की अनुमति दी जाए.
जाने-माने वायुसेना इतिहासकार पुष्पिंदर सिंह बताते हैं, "जब छंब में लड़ाई शुरू हुई 1 सितंबर, 1965 को, पाकिस्तानी सेना काफ़ी आगे आ गई थी और भारतीय सेना काफ़ी ख़तरे में थी, तो रक्षा मंत्री चव्हाण ने अर्जन सिह को बुलाया. उन्होंने उनसे पूछा, 'तुम हमारे लिए क्या कर सकते हो?' अर्जन सिंह ने कहा, 'आप मुझे 'गो अहेड' दीजिए. हम 45 मिनट के अंदर सबसे क़रीबी ठिकाने पठानकोट से अपने विमानों को उड़ा देंगे.' चव्हाण ने तुरंत हाँ कहा."
पुष्पिंदर बताते हैं, "अर्जन सिंह ने वहीं से हुक्म दिया, 'गेट एयरबौर्न.' अँधेरा हो रहा था. सब लोग पहले से ही तैयार थे. जैसे ही अर्जन सिंह का आदेश मिला 8 वैंपायर विमानों ने छंब पर बंमबारी करने के लिए उड़ान भरी. इसी को नेतृत्व कहा जाता है."
अर्जन सिंह ने सबसे अधिक नाम कमाया 1944 की बर्मा की लड़ाई में जहाँ उन्हें लार्ड माउंटबेटन ने 'डिसटिंग्विश्ड फ़्लाइंग क्रॉस' से सम्मानित किया.
पुष्पिंदर सिंह बताते हैं, "अर्जन सिंह की 'कमिशनिंग' हुई थी 1939 में 'क्रैमवेल' से. तब दूसरा विश्व युद्ध शुरू हो चुका था. तब भारतीय वायु सेना का एक ही स्कवार्डन था नंबर 1 स्कवार्डन. उनके ज़्यादातर जहाज़ थे 'लाईज़ेंडर.' उनकी शुरुआती 'पोस्टिंग' हुई थी उत्तर पश्चिम सीमाँत प्रांत में. जब जापान ने बर्मा पर हमला किया तो उस इलाके में भारी मात्रा में भारतीय सैनिक भेजे गए."
वो कहते हैं, "अर्जन सिंह नंबर 1 स्कवार्डन को 'लीड' कर रहे थे. उस समय उनकी उम्र थी मात्र 25 साल. उन्हें इंफाल भेजा गया. जब जापानी हमला शुरू हुआ तो नंबर 1 स्कवार्डन ने भारतीय सेना को 15 महीनों तक बहुत 'सपोर्ट' दिया. उन को 'इंफाल का रक्षक' और 'टाइगर्स ऑफ़ इंफाल' भी कहा गया, क्योंकि नंबर 1 स्कवार्डन का प्रतीक चिन्ह भी 'टाइगर' ही था. उनको युद्ध स्थल में ही 'डिस्टिंग्विश फ़्लाइंग क्रॉस' मिला."
पुष्पिंदर कहते हैं, "ये वायु सेना का बहुत बड़ा सम्मान होता है. लार्ड लुई माउंटबेटन दक्षिण एशिया कमान के सर्वोच्च सेनापति थे. वो खुद फ़्रंट पर गए थे अर्जन सिंह को ये सम्मान देने. इससे उनको बहुत प्रेरणा मिली."
इससे पहले अर्जन सिंह उत्तर पश्चिम सीमाँत प्रांत में वज़ीरस्तान के मीरनशाह जैसे सुदूर इलाके में तैनात थे. सितंहर 1940 में उन्होंने वहाँ से 50 उड़ानें भरीं और अगले महीने 80. इन अभियानों के दौरान कई बार उन पर ज़मीन से गोलीबारी हुई, लेकिन इन सबने उनके जुझारूपन को तोड़ा नहीं.
एयर कॉमोडोर जसजीत सिंह मार्शल अर्जन सिंह की जीवनी 'द आइकन' में एक दिलचस्प किस्सा सुनाते हैं, "जब अर्जन सिंह तीसरा ग़ोता लगा रहे थे, तब उन्हें महसूस हुआ कि उनके इंजन पर कोई गोली लगी है. उस समय विमान काफ़ी नीचाई पर था. ख़ैर किसी तरह कलाबाज़ियाँ खिलाते हुए उन्होंने अपने विमान को खैसोरा नदी के पास एक सूखी जगह पर उतार लिया."
वो लिखते हैं, "क्रैश-लैंडिंग के दौरान अर्जन सिंह का चेहरा विमान के 'इंस्ट्रुमेंट पैनल' से टकराया और उनके चेहरे पर गहरी चोट आई. लेकिन उस समय अर्जन सिंह की चिंता कुछ और ही थी. जैसे ही विमान ने 'क्रैश-लैंड' किया, उनका 'गनर' ग़ुलाम अली उतर कर दौड़ने लगा. अर्जन सिंह ने देखा कि ग़ुलाम अली उसी पहाड़ी की तरफ़ दौड़ा चला जा रहा है, जहाँ से घात लगा कर क़बीले के लोग पहले से ही गोलीबारी कर रहे थे."
एयर कॉमोडोर जसजीत सिंह आगे लिखते हैं, "एक भी लम्हा गंवाए बिना अर्जन सिंह नाक से बहते ख़ून के बावजूद तेज़ी से उसके पीछे भागने लगे और चारों तरफ़ से चल रही गोलियों के बीच 50 गज़ आगे दौड़ कर उसे पकड़ लिया और उसे उल्टी दिशा में भागने के लिए कहा, जहाँ विमान ने 'क्रैश-लैंड' किया था. हमारी अपनी सेनाएं भी इस नाटकीय घटनाक्रम को देख रही थीं. उन्होंने दोनों को बचाने के लिए क़बाएलियों पर हमला बोल दिया."
दुनिया में बहुत कम वायुसेनाध्यक्ष होंगे जिन्होंने मात्र 40 साल की उम्र में ये पद संभाला हो और सिर्फ़ 45 साल की उम्र में 'रिटायर' हो गए हों.
पुष्पिंदर सिंह बताते हैं, "जब अर्जन सिंह 1964 में वायुसेनाध्यक्ष बने तो वो बहुत युवा थे. 1962 में चीन से लड़ाई हारने के बाद भारतीय वायुसेना विस्तार और आधुनिकीकरण की योजना बना रही थी. उस समय भारत के पास मुश्किल से 20 स्कवार्डन रहे होंगे. उनके भी अधिकतर विमान जैसे मिसटियर्स, कैनबरा हंटर्स और तूफ़ानीज़ पुराने पड़ चुके थे. उनके पास थोड़े से मिग 21 भी थे. भारत के पहले मिग 21 तब आए जब अर्जन सिंह एयर चीफ़ बन रहे थे."
वो कहते हैं, "हमारी दीर्घकालिक योजना थी कि हम थोड़े से मिग 21 रूस से ख़रीदेंगे और बाकी हिंदुस्तान एयरनॉटिक्स के कारख़ाने में बनाएंगे. शुरू में पाकिस्तान के साथ हवाई लड़ाई अच्छी नहीं गई. हमारे कुछ जहाज़ गिर गए और कुछ ज़मीन पर ही बरबाद हो गए. उन्होंने रक्षा मंत्री चव्हाण से कहा कि आप हमें 'ऑपरेट' करने की आज़ादी दीजिए. चव्हाण ने उनकी ये बात मान ली."
पुष्पिंदर सिंह कहते हैं, "अगर तीन हफ़्तों के बाद युद्ध विराम नहीं हुआ होता तो इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत ने पाकिस्तान की वायु सेना को नेस्तानुबूद कर दिया होता. इसकी वजह ये थी कि भारत के पास पाकिस्तान से कहीं अधिक युद्धक विमान थे और पाकिस्तान के पास 'स्पेयर्स' की भारी कमी पड़ रही थी. लेकिन युद्ध विराम होने की वजह से भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध एक तरह से 'ड्रा ' के रूप में समाप्त हुआ था."
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