Tuesday, April 30, 2019

जब एयर मार्शल अर्जन सिंह को पाकिस्तानी वायुसेनाध्यक्ष ने किया गुप्त फ़ोन

रक्षा मंत्री यशवंतराव चव्हाण, एयर मार्शल अर्जन सिंह और रक्षा मंत्रालय में विशेष सचिव एचसी सरीन, एडजुटेंट जनरल लेफ़्टिनेंट जनरल कुमारमंगलम के साथ गहन मंत्रणा में व्यस्त थे. मुद्दा था छंब सेक्टर में उस दिन सुबह हुआ पाकिस्तानी टैंकों और तोपों का ज़बरदस्त हमला जिसने भारतीय सेना और ख़ुफ़िया एजेंसियों को अचरज में डाल दिया था.

बैठक शुरू हुए अभी आधा घंटा भी नहीं हुआ था कि थलसेनाध्यक्ष जनरल चौधरी ने कमरे में प्रवेश किया. उन्होंने एयर मार्शल अर्जन सिंह के साथ कुछ देर दबे शब्दों में बात की और रक्षा मंत्री चव्हाण की तरफ़ देख कर कहा कि उन्हें छंब सेक्टर में वायु सेना के इस्तेमाल की अनुमति दी जाए.

जाने-माने वायुसेना इतिहासकार पुष्पिंदर सिंह बताते हैं, "जब छंब में लड़ाई शुरू हुई 1 सितंबर, 1965 को, पाकिस्तानी सेना काफ़ी आगे आ गई थी और भारतीय सेना काफ़ी ख़तरे में थी, तो रक्षा मंत्री चव्हाण ने अर्जन सिह को बुलाया. उन्होंने उनसे पूछा, 'तुम हमारे लिए क्या कर सकते हो?' अर्जन सिंह ने कहा, 'आप मुझे 'गो अहेड' दीजिए. हम 45 मिनट के अंदर सबसे क़रीबी ठिकाने पठानकोट से अपने विमानों को उड़ा देंगे.' चव्हाण ने तुरंत हाँ कहा."

पुष्पिंदर बताते हैं, "अर्जन सिंह ने वहीं से हुक्म दिया, 'गेट एयरबौर्न.' अँधेरा हो रहा था. सब लोग पहले से ही तैयार थे. जैसे ही अर्जन सिंह का आदेश मिला 8 वैंपायर विमानों ने छंब पर बंमबारी करने के लिए उड़ान भरी. इसी को नेतृत्व कहा जाता है."

अर्जन सिंह ने सबसे अधिक नाम कमाया 1944 की बर्मा की लड़ाई में जहाँ उन्हें लार्ड माउंटबेटन ने 'डिसटिंग्विश्ड फ़्लाइंग क्रॉस' से सम्मानित किया.

पुष्पिंदर सिंह बताते हैं, "अर्जन सिंह की 'कमिशनिंग' हुई थी 1939 में 'क्रैमवेल' से. तब दूसरा विश्व युद्ध शुरू हो चुका था. तब भारतीय वायु सेना का एक ही स्कवार्डन था नंबर 1 स्कवार्डन. उनके ज़्यादातर जहाज़ थे 'लाईज़ेंडर.' उनकी शुरुआती 'पोस्टिंग' हुई थी उत्तर पश्चिम सीमाँत प्रांत में. जब जापान ने बर्मा पर हमला किया तो उस इलाके में भारी मात्रा में भारतीय सैनिक भेजे गए."

वो कहते हैं, "अर्जन सिंह नंबर 1 स्कवार्डन को 'लीड' कर रहे थे. उस समय उनकी उम्र थी मात्र 25 साल. उन्हें इंफाल भेजा गया. जब जापानी हमला शुरू हुआ तो नंबर 1 स्कवार्डन ने भारतीय सेना को 15 महीनों तक बहुत 'सपोर्ट' दिया. उन को 'इंफाल का रक्षक' और 'टाइगर्स ऑफ़ इंफाल' भी कहा गया, क्योंकि नंबर 1 स्कवार्डन का प्रतीक चिन्ह भी 'टाइगर' ही था. उनको युद्ध स्थल में ही 'डिस्टिंग्विश फ़्लाइंग क्रॉस' मिला."

पुष्पिंदर कहते हैं, "ये वायु सेना का बहुत बड़ा सम्मान होता है. लार्ड लुई माउंटबेटन दक्षिण एशिया कमान के सर्वोच्च सेनापति थे. वो खुद फ़्रंट पर गए थे अर्जन सिंह को ये सम्मान देने. इससे उनको बहुत प्रेरणा मिली."

इससे पहले अर्जन सिंह उत्तर पश्चिम सीमाँत प्रांत में वज़ीरस्तान के मीरनशाह जैसे सुदूर इलाके में तैनात थे. सितंहर 1940 में उन्होंने वहाँ से 50 उड़ानें भरीं और अगले महीने 80. इन अभियानों के दौरान कई बार उन पर ज़मीन से गोलीबारी हुई, लेकिन इन सबने उनके जुझारूपन को तोड़ा नहीं.

एयर कॉमोडोर जसजीत सिंह मार्शल अर्जन सिंह की जीवनी 'द आइकन' में एक दिलचस्प किस्सा सुनाते हैं, "जब अर्जन सिंह तीसरा ग़ोता लगा रहे थे, तब उन्हें महसूस हुआ कि उनके इंजन पर कोई गोली लगी है. उस समय विमान काफ़ी नीचाई पर था. ख़ैर किसी तरह कलाबाज़ियाँ खिलाते हुए उन्होंने अपने विमान को खैसोरा नदी के पास एक सूखी जगह पर उतार लिया."

वो लिखते हैं, "क्रैश-लैंडिंग के दौरान अर्जन सिंह का चेहरा विमान के 'इंस्ट्रुमेंट पैनल' से टकराया और उनके चेहरे पर गहरी चोट आई. लेकिन उस समय अर्जन सिंह की चिंता कुछ और ही थी. जैसे ही विमान ने 'क्रैश-लैंड' किया, उनका 'गनर' ग़ुलाम अली उतर कर दौड़ने लगा. अर्जन सिंह ने देखा कि ग़ुलाम अली उसी पहाड़ी की तरफ़ दौड़ा चला जा रहा है, जहाँ से घात लगा कर क़बीले के लोग पहले से ही गोलीबारी कर रहे थे."

एयर कॉमोडोर जसजीत सिंह आगे लिखते हैं, "एक भी लम्हा गंवाए बिना अर्जन सिंह नाक से बहते ख़ून के बावजूद तेज़ी से उसके पीछे भागने लगे और चारों तरफ़ से चल रही गोलियों के बीच 50 गज़ आगे दौड़ कर उसे पकड़ लिया और उसे उल्टी दिशा में भागने के लिए कहा, जहाँ विमान ने 'क्रैश-लैंड' किया था. हमारी अपनी सेनाएं भी इस नाटकीय घटनाक्रम को देख रही थीं. उन्होंने दोनों को बचाने के लिए क़बाएलियों पर हमला बोल दिया."

दुनिया में बहुत कम वायुसेनाध्यक्ष होंगे जिन्होंने मात्र 40 साल की उम्र में ये पद संभाला हो और सिर्फ़ 45 साल की उम्र में 'रिटायर' हो गए हों.

पुष्पिंदर सिंह बताते हैं, "जब अर्जन सिंह 1964 में वायुसेनाध्यक्ष बने तो वो बहुत युवा थे. 1962 में चीन से लड़ाई हारने के बाद भारतीय वायुसेना विस्तार और आधुनिकीकरण की योजना बना रही थी. उस समय भारत के पास मुश्किल से 20 स्कवार्डन रहे होंगे. उनके भी अधिकतर विमान जैसे मिसटियर्स, कैनबरा हंटर्स और तूफ़ानीज़ पुराने पड़ चुके थे. उनके पास थोड़े से मिग 21 भी थे. भारत के पहले मिग 21 तब आए जब अर्जन सिंह एयर चीफ़ बन रहे थे."

वो कहते हैं, "हमारी दीर्घकालिक योजना थी कि हम थोड़े से मिग 21 रूस से ख़रीदेंगे और बाकी हिंदुस्तान एयरनॉटिक्स के कारख़ाने में बनाएंगे. शुरू में पाकिस्तान के साथ हवाई लड़ाई अच्छी नहीं गई. हमारे कुछ जहाज़ गिर गए और कुछ ज़मीन पर ही बरबाद हो गए. उन्होंने रक्षा मंत्री चव्हाण से कहा कि आप हमें 'ऑपरेट' करने की आज़ादी दीजिए. चव्हाण ने उनकी ये बात मान ली."

पुष्पिंदर सिंह कहते हैं, "अगर तीन हफ़्तों के बाद युद्ध विराम नहीं हुआ होता तो इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत ने पाकिस्तान की वायु सेना को नेस्तानुबूद कर दिया होता. इसकी वजह ये थी कि भारत के पास पाकिस्तान से कहीं अधिक युद्धक विमान थे और पाकिस्तान के पास 'स्पेयर्स' की भारी कमी पड़ रही थी. लेकिन युद्ध विराम होने की वजह से भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध एक तरह से 'ड्रा ' के रूप में समाप्त हुआ था."

Thursday, April 4, 2019

मेसी ने 90वें मिनट में फ्री-किक पर गोल कर हार से बचाया, बार्सिलोना और विलारियल का मैच ड्रॉ

बार्सिलोना/विलारियल. स्पेन का फुटबॉल क्लब बार्सिलोना मंगलवार रात ला लिगा में विलारियल से 2-4 से पीछे था। मैच के 90वें मिनट में लियोनेल मेसी ने फ्री-किक पर गोल किया। इसके बाद लुईस सुआरेज ने 90+3वें मिनट में गोल किया। मैच 4-4 की बराबरी पर खत्म हुआ। बार्सिलोना 30 मैच में 70 पॉइंट के साथ टॉप पर है। मेसी ने करिअर में 47वीं बार फ्री-किक पर गोल किया। उनके नाम फ्री-किक पर गोल करने का रिकॉर्ड है। उन्होंने लगातार तीसरे मैच में फ्री-किक पर गोल किया। मेसी के टीम साथी उन्हें फ्री-किक का किंग कहते हैं।

मेसी 9.15 मी दूर से शॉट जमाते हैं
यूनिवर्सिटी ऑफ बार्सिलोना की रिसर्च के अनुसार- मेसी टॉप लेफ्ट कॉर्नर से इतने परफेक्ट तरीके से फ्री-किक लेते हैं कि गेंद खिलाड़ियों और गोलकीपर को चकमा देते हुए गोलपोस्ट तक पहुंच जाती है। किक के पहले मेसी गेंद को रोकते हैं, सिर उठाते हैं और बॉडी को हल्का झुकाते हुए गेंद पर किक करते हैं। उनकी फ्री-किक पर गोल करने की टेक्नीक साल दर साल बेहतर होती जा रही है।

डेब्यू के बाद शुरुआती 10 साल में उन्होंने सिर्फ 19 गोल फ्री-किक पर किए। जबकि पिछले 4 सीजन में 27 गोल किए हैं। बार्सिलोना के टीम साथी सर्जियो बस्केट्स कहते हैं, 'मेसी ट्रेनिंग के दौरान भी उतने ही कनसिस्टेंट होते हैं, जितने मैदान पर मैच के दौरान। यहां तक कि ट्रेनिंग में भी उनके फ्री-किक पर गोल करने का औसत 100 प्रतिशत रहता है। फ्री-किक पर गोल करने के मामले में दुनिया में उनसे बेस्ट खिलाड़ी कोई नहीं है। उनकी किसी से तुलना नहीं हो सकती।'

स्पेनिश स्पोर्ट्स अखबार मार्का की रिपोर्ट के अनुसार, मेसी ट्रेनिंग के दौरान फ्री-किक की भी प्रैक्टिस करते हैं। परफेक्ट फ्री-किक के लिए ताकत, पोजीशनिंग, स्ट्राइकिंग, बैलेंस और विजन इन 5 स्किल की जरूरत होती है। इनके लिए वे अपने और गोलपोस्ट के बीच प्लास्टिक की डॉल रखते हैं और फिर फ्री-किक जमाते हैं। वे ऐसे गोल करने की प्रैक्टिस करते हैं, जिससे डॉल गिर न पाए। उनके और गोलपोस्ट के बीच की दूरी 9.15 मीटर होती है। शॉट जमाते समय उनका पैर 50 डिग्री के एंगल पर मुड़ा रहता है।

16 महीने में सबसे ज्यादा गोल का रिकॉर्ड
7 वीं बार फ्री-किक पर गोल किया मेसी ने मौजूदा सीजन में। यह उनके करिअर का बेस्ट है।
12 गोल फ्री-किक पर किए मेसी ने पिछले 16 महीने में। दुनिया में सबसे ज्यादा।
13 शॉट के बाद पहली बार फ्री-किक पर गोल कर पाए थे मेसी 2008 में।
11 लगातार 11 सीजन में मेसी ने फ्री-किक पर गोल किए। 407 शॉट पर 32 फ्री-किक गोल।
मेसी पूरा पैर जमीन पर रखकर शॉट जमाते हैं, जिससे उनकी स्टेबिलिटी और शॉट पर कंट्रोल ज्यादा रहता है। एक्यूरेसी के लिए कंधों और छाती को झुकाते हुए शरीर को कॉम्पेक्ट पोजीशन पर ले जाते हैं। इसलिए उन्हें डेड बॉल स्पेशलिस्ट कहा जाता है।

मेसी फ्री-किक जमाते समय मैग्नस इफेक्ट का इस्तेमाल करते हैं। इसमें गेंद जमीन पर पड़ने के बाद आगे की तरफ जाने की जगह पीछे की तरफ मूव करती है। गोलकीपर को लगता है कि गेंद सीधी जाएगी लेकिन गेंद की दिशा बदल जाती है।

गोलकीपर को कन्फ्यूज करना ही कौशल : मेसी
ईमानदारी से कहूं तो मुझे खिलाड़ियों के ऊपर से गोल करना बहुत पसंद है। मुझे ऐसा गोल करना अच्छा लगता है, जिसमें गोलकीपर को समझ ही नहीं आए कि मैं किस साइड गोल कर रहा हूं। गोलकीपर को कन्फ्यूज करना ही हर खिलाड़ी का कौशल है।'

Wednesday, January 23, 2019

英国脱欧纷扰未了 法德再签约宣告睦邻友好同仇敌忾

英国还在为脱离欧盟纠结不已,法国和德国又高调地重温半个多世纪前的睦邻友好、同仇敌忾的誓言,签署了《亚琛条约》,宣告法德友好合作的决心和行动目标。

时间、地点、事件,无不晕染厚重的历史色彩。

法国总统马克龙和德国总理默克尔1月22日在德国西部边境城市亚琛签署两国友好合作条约,与1963年1月22日他们各自的前辈在巴黎签署的《爱丽舍宫条约》遥相呼应。

当年的条约和签约这件事本身,被视为变仇敌为睦邻、化干戈为玉帛、世代友好的历史宣言和象征。

今天的新版友谊宣言,被观察人士解读为意在重振法德轴心在欧盟内的地位。

地点选在亚琛, 更加重了历史和象征色彩。历史上亚琛曾被归入法国版图,阿尔萨斯-洛林地区说法语还是德语曾经是爱不爱国的选择,地区的归属在历史课本上占据了相当篇幅。

《亚琛条约》大致可以看作1963年1月22日签署的法德友好合作条约,《爱丽舍宫条约》的新版。

法国和德国承诺在涉及欧盟的重大议题上保持一致立场,发表共同声明。

此外,双方还计划在联合国以"共同体"的形象出现,步调一致,同进共退。

根据条约,两国在外交政策、国内外安全事务和其他诸多领域都将异口同声。

具体而言,巴黎和柏林承诺:

建立法德"经济区",以此深化两国经济交融;
提升欧洲军事实力,共同投资于"拾遗补缺",以达到强化欧盟和北约的目的;
成立法德防务与安全理事会,同时各自在本国军营里倡导和培育"共同文化",联合部署、调遣;
两国还承诺加强青年文化交流,各自在国内倡导学习对方的语言,最终目标是创办一所法德联合兴办的大学。

另外,还计划进一步密切法德边境地区的双边往来交流,加深边境线两侧的"双语性"。

就在56年前,1963年1月22日,彰显法德友好合作的《爱丽舍宫条约》在巴黎签署,向世界宣告双方化干戈为玉帛,世仇变睦邻。

自那以后,两国历届政府都多次祭出这份条约文本,重申法德友好、合作精神。

德国康斯塔茨大学国际关系教授德克·卢芬(Dirk Leuffen)认为,《亚琛条约》的精神跟它要取代的《爱丽舍宫条约》没有戏剧性的变化,更多是传承,或者说是翻新原有的目标,使之显得与时俱进,更切合两国当下面临的挑战。

他认为新条约勾勒的经济合作方案,明显就是两国密切联盟的下一步。

但英国卡迪夫大学教授阿利斯泰·科尔(Alistair Cole)认为,新的友好条约更多是一种象征性姿态。

在英国脱欧的大背景下,法国和德国重申56年前的友好合作誓言,是希望昭示天下,欧盟的核心和引擎依旧是法德,"虽然在现实中两个国家经常有分歧闹矛盾"。

德国总理默克尔解释说,新签这个友好条约,主要因为时代变了,世界跟半个多世纪前不一样了,而且现在大家面临的重大课题,比如欧洲一体化,当时连个雏形都还没有。

一些欧盟国家不太乐意看到法国和德国如此高调秀友谊,认为这两个国家在欧盟已经势力太大了。中欧和东欧国家在移民问题上已经公开拒绝听从德法的引领。

意大利也不喜欢德法联手扩充势力。意大利内政部长马泰奥·萨尔维尼毫不讳言,现在该"用意大利-波兰轴心抗衡法-德轴心"。

他说这话时正在波兰访问,此行主要目的是想在今年5月欧洲议会选举前合纵连横,组成一个挑战欧盟内法德主导地位的联盟。

法国国内冒出不少反对条约的阴谋论,声称马克龙总统签约把法国领土拱手送人。法国社交媒体上盛传亚琛条约将导致阿尔萨斯和洛林边境地区事实上让给了德国,即使官方奋力辟谣也未能平息风波。

极右翼领袖勒庞甚至指责马克龙去亚琛跟默克尔签新的法德友好合作条约,就等于在摧毁戴高乐将军取得的成果,即带领法国侪身世界一流大国行列。

Monday, January 7, 2019

मार-धाड़ वाली टीवी सिरीज़ के दीवानें क्यों होते हैं लोग?

अपराध गुनाह है और इसकी सज़ा भी तय है. फिर भी इंसान गुनाह करता है. कई बार अपराध के बाद इंसान ख़ुद ही पशेमान हो जाता है और जुर्म क़ुबूल कर लेता है.

लेकिन बहुत मर्तबा वो इतनी सफ़ाई से गुनाह करता है कि उसके निशान तक बाक़ी नहीं रहते. अपराध पर लगाम कसने वाली और अपराधी को पकड़ने वाली एजेंसियां भी घनचक्कर बनकर रह जाती हैं.

मिसाल के लिए भारत की मशहूर मर्डर मिस्ट्री आरूषि के केस को ही लीजिए. पुलिस इस केस में पर्याप्त सबूत तक नहीं जुटा पाई.

हालांकि, मौक़े पर मौजूद सबूतों के आधार पर आरूषि के माता-पिता को मुजरिम माना गया और उन्हें जेल में रहना पड़ा. लेकिन बाद में कोर्ट ने ये कहते हुए उन्हें बरी कर दिया कि सिर्फ़ परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर उन्हें मुजरिम नहीं माना जा सकता.

इस मर्डर मिस्ट्री पर किताब लिखी गई, फ़िल्म बनी. लेकिन ये क़त्ल एक राज़ ही बना रहा.

इसी तरह गुरुग्राम के नामी स्कूल में बच्चे का क़त्ल या हाल ही में दिल्ली में एक परिवार के 11 लोगों के एक साथ ख़ुदकुशी करने की घटनाएं.

इंसान की अपराध में दिलचस्पी शुरुआत से रही है. तभी तो साहित्य में भी इसे जगह मिली. अंग्रेजी में शरलॉक होम्स हों या उर्दू के इब्ने सफ़ी. इनकी लिखी कहानियों में ख़ालिस जुर्म का बखान होता था. लेकिन फिर भी लोग उसे ख़ूब चाव से पढ़ते थे.

इनकी किताबों के मुख्य किरदार आम लोगों के लिए हीरो बन जाते थे. लोगों की इसी रुचि को बाज़ार ने भी ख़ूब भुनाया. यही वजह है कि आज एंटरटेनमेंट चैनल हों या न्यूज़ चैनल सभी जगह क्राइम का एक शो देखने को मिल ही जाता है.

यहां तक की एंटरटेनमेंट के नए प्लेटफॉर्म जैसे नेटफ्लिक्स और प्राइम वीडियो पर भी द सेक्रेड गेम्स और मिर्ज़ापुर या अपहरण जैसे सीरियल धूम मचाए हुए हैं. ये वही सीरियल हैं जो जुर्म की दुनिया को आम लोगों तक पहुंचाते हैं.

दरअसल जुर्म पर आधारित साहित्य, फ़िल्म या सीरियल में दिखाई जाने वाली कहानियां कहीं ना कहीं असल ज़िंदगी में घटी घटनाओं से प्रभावित होती हैं. दुनिया भर में ऐसी अनगिनत मर्डर मिस्ट्री, डकैती और अपहरण की घटनाएं हैं जो अनसुलझी हैं. आज जुर्म की ऐसी ही अनसुलझी पहेलियों की बात हम आपसे करेंगे.

दुनिया की बड़ी मर्डर मिस्ट्री पर बीबीसी ने डेथ इन आइस वेली नाम का एक पॉडकास्ट किया था जिसमें द इस्डाल वुमेन की मर्डर मिस्ट्री सुलझाने की कोशिश की गई थी. ये घटना साल 1970 की थी.

नॉर्वे में इस्डालिन वैली के पास एक महिला की जली हुई लाश मिली थी. उसके शरीर पर कपड़े नहीं थे और अजीब सी चीजें उसके पास पड़ी थीं. बाद में पुलिस को एक जाली पासपोर्ट मिला लेकिन ये महिला कौन थी ये किसी को आज तक पता नहीं चल पाया.

मीडिया ने इसे द इस्डाल वुमेन का नाम दिया. ये क़त्ल था या ख़ुदकुशी, ये भी आज तक पता नहीं चला. 2018 में नॉर्वे के खोजी पत्रकार मैरियट हिगराफ़ और डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म मेकर नाइल मैक्कार्थी ने भी इस केस को सुलझाने की कोशिश की लेकिन कामयाबी नहीं मिली.

इसी तरह 2017 की ब्लॉकबस्टर पॉडकास्ट सीरीज़ है एस-टाउन. ये सीरीज़ जॉन बी.मैक्लेमोर नाम के घड़ीसाज़ का दिलजस्प प्रोफ़ाइल है जिसका ताल्लुक़ अमरीका के अलाबामा से है.

हालांकि इस सीरीज़ में मुख्य किरदार की बहुत सी निजी बातों को उसकी मर्ज़ी के बग़ैर लोगों तक पहुंचा दिया गया था.जिसके ख़िलाफ़ मैक्लेमोर ने कोर्ट में केस दाख़िल कर दिया था.

एस-टाउन ने एक कथित क़त्ल की छानबीन की थी और इस पॉडकास्ट की कामयाबी ने साबित कर दिया कि लोगों में जुर्म के क़िस्सों को सुनने की कितनी ललक है. इस पॉडकास्ट की कामयाबी का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि साल 2017 से अब तक इसे 80 लाख बार डाउनलोड किया जा चुका है.

इसी तरह, इन द डार्क नाम के खोजी पत्रकारिता के पॉडकास्ट के पहले सीज़न में 11 साल के एक बच्चे के अपहरण की कहानी को बताया गया था जो मिनेसोटा में घर के बाहर साइकिल चलाते समय अग़वा कर लिया गया था.

दूसरे सीज़न में मिसिसिपी के कर्टिस फ्लावर्स नाम के एक शख़्स की कहानी बताई गई थी जिसने 1996 में एक फ़र्नीचर शॉप में चार मज़दूरों को मार डाला था. ये वही फ़र्नीचर शॉप थी जहां वो ख़ुद पहले काम कर चुका था.

Tuesday, November 20, 2018

भाजपा को गढ़ बचाने और कांग्रेस को भेदने की चुनौती यहां चार मुद्दे पानी

 भोपाल. अब तक के 14 विधानसभा चुनावो में से 11 बार भाजपा और जनसंघ के प्रतिनिधियों को गले लगाने वाली बैरसिया सीट पर इस बार पानी, बिजली, बाहरी और बागी ने गढ़ बचाने की चुनौती खड़ी कर दी है। भाजपा प्रत्याशी को उम्मीद है कि योगी आदित्यनाथ की जल्द होने वाली सभा से स्थिति बदलेगी। आरएसएस की गहरी जड़ों वाली और भाजपा के गढ़ बैरसिया के मतदाताओं में दौड़ रहे अंडर करंट ने इस बार मुश्किल बढ़ा दी है। भाजपा ने मौजूदा विधायक विष्णु खत्री का टिकट बुक किया तो पूर्व विधायक ब्रह्मानंद रत्नाकर बागी हो गए। खत्री को कांग्रेस की जयश्री हरिकरण, बसपा की अनीता अहिरवार के साथ ही निर्दलीय रत्नाकर से चुनौती मिल रही है। रत्नाकर स्थानीय हैं और वे कांग्रेस-भाजपा प्रत्याशियों को बाहरी बताते हुए वोट मांग रहे हैं।

मतदाताओं का मिजाज पर्याप्त बिजली नहीं मिलने, सिंचाई के संसाधन उपलब्ध नहीं होने से तीखा है। 110 पंचायतों में फैली बैरसिया विधानसभा में 304 गांव आते हैं। क्षेत्र में बड़े तालाब, बड़ी नदी या डैम नहीं होने से सिंचाई का पानी उपलब्ध नहीं है। करीब 80 फीसदी ग्रामीण इलाके वाली सीट पर भाजपा के लिए यही सबसे बड़ी परेशानी है। इस मुद्दे को हवा देकर कांग्रेस और निर्दलीय माहौल अपने पक्ष में करने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं।

रोड़िया गांव में कांग्रेस प्रत्याशी की चुनावी कमान संभाल रहे पूर्व जिलाध्यक्ष (ग्रामीण) अवनीश भार्गव कहते हैं 50 साल बाद भी बैरसिया के ग्रामीण पानी के लिए तरस रहे हैं। पारूवा कलारा डैम बनाने का दावा किया था, जिसका काम अब तक शुरू नहीं हुआ है। अगर हमारी सरकार आई तो डैम बना देंगे, नहरें निकालेंगे। कांग्रेस की जनपद सदस्य सीमा भार्गव कहती हैं भाजपा ने जमीन पर कोई काम नहीं किया। असहाय वृद्धों को न तो पेंशन मिल रही है और न ही कोई सहारा। कुछ एेसी ही राय गांव के दूसरे मतदाता भी रखते हैं।

अब तक चुनाव 14 - भाजपा-जनसंघ 11, कांग्रेस- 3  1951, 1957 एवं 1998 में
प्रत्याशी- 8, दौड़ में ये 4 - ब्रह्मानंद रत्नाकर निर्दलीय, विष्णु खत्री, जयश्री हरिकरण, ब्रह्मानंद रत्नाकर और अनीता अहिरवार।

त्रिकोणीय मुकाबले के तीन फैक्टर

भाजपा के बागी ब्रह्मानंद रत्नाकर और बसपा प्रत्याशी अनीता अहिरवार ने मुकाबले को कड़ा बना दिया
रत्नाकर के परिवार के पास शराब का पैतृक कारोबार है और एक बड़ा वर्ग उनसे जुड़ा हुआ है
पहले दलित और मुस्लिम वोट कांग्रेस को थोकबंद मिलते थे, अब बसपा इसमें हिस्सेदार बन रही है

इस क्षेत्र के चार प्रमुख मुद्दे

यहां पानी, बिजली, बाहरी और बागी चार प्रमुख मुद्दे हैं। भाजपा के बागी और निर्दलीय चुनाव लड़ रहे ब्रह्मानंद रत्नाकर दोनों ही दलों के प्रत्याशी को बाहरी बता कर जनता से समर्थन मांग रहे हैं। यह मुद्दा कुछ हद तक असर भी डाल रहा है।

समीकरण

सारा खेल बागी के रुख पर टिका है। यदि उनका स्थानीय बनाम बाहरी का नारा चल गया तो दोनों की मुसीबत बढ़ जाएगी। बैरसिया में 211010 मतदाता हैं। इनमें सबसे ज्यादा 35 हजार वोटर दलित वर्ग से हैं। इस वर्ग में भी सबसे ज्यादा तादाद अहिरवार समाज की है। जयश्री और अनीता इसी समाज से ही हैं।

चुनावी गुणा-भाग

भाजपा का पूरा जोर अपने पारंपरिक वोट बैंक को सहेजने पर है। इसके लिए उसने सांसद आलोक संजर और भगवान दास सबनानी को लगाया है। वहीं कांग्रेस की निगाहें बागी पर टिकी हैं। 15 हजार मुस्लिम वोटों पर भी उन्हें भरोसा है।

न सड़कें बनीं, न पानी मिला, स्कूल भी खाली

भाजपा ने कुछ नहीं किया। क्षेत्र में न तो सड़कें बनीं और न ही पानी की व्यवस्था हुई। स्कूल- अस्पताल खोल दिए, लेकिन टीचर्स और डॉक्टर्स नहीं हैं। विधायक लोगों को सुलभ नहीं हैं।

Thursday, November 1, 2018

威尔士何以成为“歌唱之乡”

想象一下:你和7.5万人在爆满的体育场里,几乎人人同声齐唱。唱的不是流行歌曲,而是圣诗;看的也不是演唱会,而是橄榄球赛。可这不是臆想假设,这就是事实。在威尔士首府加的夫,这不过是国家体育场一个常规比赛日。

威尔士人有两大爱好——橄榄球和歌唱——人们一起看球时,会突然放声歌唱,拦都拦不住。其实正相反,赛前、中场和赛后,助兴的合唱团会在球场上鼓励人们参与,带领大家演唱威尔士橄榄球比赛的固定曲目——一组传统的宗教圣诗(《纯洁的心》(Calon Lân)、《朗达小溪谷》(Cwm Rhonnda)和《宝血宏恩歌》(Gwahoddiad)),在威尔士标准的红白喜事上,你也可能听到。

如今,我已经在家乡威尔士以外度过了三分之一的人生,但直到去年才有了思乡之情——不是想念具体的家,而是追忆那份威尔士人共有的历史发展、民族特征和峥嵘岁月。威尔士语中也刚好专门有一个词来形容:hiraeth,指对于故土(威尔士)的深情向往,英语里没有对应的词。我现在住在伦敦,身边的威尔士人不多。身在异乡,我只知道能这样和同乡联络感情:加入威尔士合唱团。

合唱团及合唱是我们的传统。从悉尼到波士顿,世界各地都有威尔士合唱团,那在伦敦找到一家该是必然之事。谷歌一搜,显示至少有五家。九月一个阴沉的周二晚上,我来到伦敦塔桥附近的威尔士公共教堂,感觉像是回到了家。约有40个不同年纪的人声情并茂地唱着我耳熟能详的歌曲(又听到了《朗达小溪谷》和《纯洁的心》),之后又到小酒馆里接着唱,我仿佛置身于一次家庭聚会。

1941年上映的奥斯卡获奖影片《青山翠谷》(How Green Was My Valley)改编自英国小说家勒埃林(Richard Llewellyn)的同名小说,讲述了19世纪末威尔士矿区的生活,影片中有一句话:"威尔士人要唱歌就像看东西要用眼睛一样自然。"此话不假,我们威尔士人从小就在学校里、在聚会上、在教堂里处处唱着歌。我们甚至还有国家诗歌音乐艺术节(National Eisteddfod),这是欧洲规模最大的诗歌音乐竞赛大会。歌唱是威尔士的特征和传统,可是原因何在?

艺术节(Eisteddfod,指诗歌和音乐的大会)的传统可以追溯到12世纪。今天,音乐和诗歌具有重要的文化意义,民谣能将故事代代相传。歌唱和诗朗诵(有时为配乐诗朗诵,威尔士语称Cerdd Dant,指以竖琴伴奏演唱)往往是其中一部分,在现代的艺术节中仍发挥着重要作用。

威尔士语直抒浪漫,富有诗意,可能也影响了这些传统。南威尔士大学荣休历史学教授加雷斯·威廉姆斯(Gareth Williams)认为"威尔士语有辅音性质,像意大利语和德语那样,适合鲜明的表达" 。英国作家托尔金(JRR Tolkien)在《霍比特人》(The Hobbit)和《指环王》(Lord of the Rings)中创造的精灵语系音律优美,显然是以威尔士语为基础。

从威尔士到苏格兰 那些“消失”后重生的语言
到“世界的尽头”法罗群岛旅行
文化揭秘:荷兰人的直率从何而来?
因为政治因素而移居海外的人
你说话的口音反映出什么?
改变英语的爱尔兰训鹰术

直接来到18世纪,威尔士确实为其"歌唱之乡"的美名奠定了基础。煤炭和铁矿行业不断壮大,大不列颠乡村人口和外来移民涌入威尔士寻求工作机会,令人口大幅增长。当时,英国国教循道主义复兴运动在威尔士各主要传教士的推动下方兴未艾,新派教堂也迅速拔地而起。新社区使得歌唱变得愈加重要,在矿区还出现了集体咏唱,特别是在煤矿资源丰富的南威尔士河谷地区。

加雷斯·威廉姆斯教授说:“在陌生的新环境里,他们在歌曲中寻求慰藉和交集。在物质贫乏的社会里,声音是最民主的——无需花销,大多数人都有声音。礼拜堂里,男女工人在日常劳苦中找到了安慰,礼拜堂鳞次栉比——到1900年有5000多座——是最多的建筑,也主导了人们的社会和文化生活。”

当时的威尔士男性人口居多(鼎盛时期煤矿和铁矿的矿工约有25万人),男性唱歌的也越来越多,这项传统保存至今。男性唱歌如此广受赞颂寻常可见,这样的社会、国家或文化可为数不多。

威尔士宝路合唱团(Côr y Boro Welsh Choir,也是我加入的合唱团)和威尔士男声合唱团时尚先声(Eschoir)的音乐总监迈克·威廉姆斯(Mike Williams)也在伦敦,他说,“合唱能让矿工逃离矿井里的辛劳与危险。1895年,老橡树男声合唱团(Treorky Male Choir)一身正装亮相温莎城堡的圣乔治厅,为维多利亚女王献唱,据说女王称'他们举止得体声如天籁'。时至今日,人人都有喜欢的威尔士合唱团!